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केशवानंद भारती मामला (1973) भारतीय न्यायिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण फैसला है, जिसने संसद की संविधान संशोधन की असीमित शक्तियों पर रोक लगाई
पृष्ठभूमि और संघर्ष
| 🔖 29वाँ संविधान संशोधन, 1972 — क्या था? |
| यह संशोधन केशवानंद भारती वाद को प्रत्यक्ष रूप से उकसाने वाला कारण बना। |
| इस संशोधन द्वारा दो केरल कानूनों को 9वीं अनुसूची में जोड़ा गया: |
| 1. Kerala Land Reforms Act, 1963 (संशोधित 1969) |
| 2. Kerala Land Reforms (Amendment) Act, 1971 |
| 9वीं अनुसूची में रखने का अर्थ: ये कानून अनु. 31B के तहत न्यायिक समीक्षा से परे हो जाते। |
| अर्थात — इन कानूनों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। |

| पहलू | विवरण |
| संशोधन वर्ष | 1972 (लागू: जनवरी 1973) |
| 9वीं अनुसूची | 1951 में 1st संशोधन द्वारा जोड़ी — भूमि सुधार कानूनों की रक्षा |
| अनु. 31B | 9वीं अनुसूची के कानून — मौलिक अधिकार उल्लंघन पर अदालत में चुनौती नहीं |
| केशवानंद का तर्क | यदि 9वीं अनुसूची न्यायिक समीक्षा से परे है, तो यह Basic Structure तोड़ता है |
| अंतिम परिणाम | I.R. Coelho (2007): 9वीं अनुसूची भी Basic Structure से परे नहीं |
29वाँ संशोधन ही वह trigger था जिसने केशवानंद भारती को सर्वोच्च न्यायालय जाने पर मजबूर किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह संशोधन न केवल उनके मौलिक अधिकार छीनता है, बल्कि स्वयं संविधान के ढाँचे को भी नष्ट करता है।
केशवानंद भारती मामला (1973) जो यह तय करता है कि संसद संविधान के मुख्य स्वरूप (जैसे- लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्यायिक समीक्षा) को नहीं बदल सकती।
| 👨⚖️ नानी पालकीवाला — कौन थे? |
| पूरा नाम: नानाभॉय अर्देशिर पालकीवाला (Nani Ardeshir Palkhivala) |
| जन्म: 16 जनवरी, 1920 — मुंबई |
| पेशा: भारत के महानतम संवैधानिक वकीलों में से एक |
| विशेषता: संवैधानिक कानून, कर कानून, अंतर्राष्ट्रीय कानून |
| अन्य भूमिका: भारत के राजदूत — अमेरिका (1977-79) |
| केशवानंद केस में: याचिकाकर्ता की ओर से मुख्य वकील |
पालकीवाला ने 68 दिनों की सुनवाई में जो तर्क दिए, वे भारतीय कानूनी इतिहास की धरोहर हैं:

| 💬 पालकीवाला के ऐतिहासिक वचन |
| “The Constitution is not a mere political document; it is a social contract between the people |
| and their representatives. No generation has the right to mortgage the future of |
| all subsequent generations by destroying the basic framework of the Constitution.” |
| अर्थ: संविधान केवल एक राजनीतिक दस्तावेज नहीं है — यह जनता और उनके प्रतिनिधियों के बीच |
| एक सामाजिक अनुबंध है। किसी एक पीढ़ी को यह अधिकार नहीं कि वह संविधान के मूल ढाँचे को |
| नष्ट करके आने वाली पीढ़ियों का भविष्य गिरवी रख दे। |
| “A Parliament elected on adult franchise cannot be granted the power to destroy |
| the very document which created it and gave it authority.” |
| पक्ष | पालकीवाला का योगदान |
| कानूनी तर्क | Basic Structure की अवधारणा को परिष्कृत रूप दिया |
| गोलकनाथ का संतुलन | न पूर्ण असंशोधनीयता, न असीमित शक्ति — मध्य मार्ग प्रस्तुत किया |
| 7:6 निर्णय | उनके तर्कों ने बहुमत को प्रभावित किया |
| 42वें संशोधन पर | 1976 में भी पालकीवाला ने 42वें संशोधन की आलोचना की |
| राष्ट्रीय योगदान | उन्हें ‘भारतीय संविधान का संरक्षक’ कहा जाता है |
केशवानंद भारती ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की और तर्क दिया कि:

| ⚖️ मुख्य प्रश्न जो न्यायालय के सामने थे |
| 1. क्या संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी भाग को संशोधित कर सकती है? |
| 2. क्या 24वाँ संशोधन (जो संसद को मौलिक अधिकार बदलने की शक्ति देता है) वैध है? |
| 3. क्या 25वाँ संशोधन (अनु. 31C — संपत्ति) न्यायिक समीक्षा से परे है? |
| 4. क्या गोलकनाथ वाद का निर्णय सही था? |
यह मामला 13 न्यायाधीशों की अब तक की सबसे बड़ी संवैधानिक पीठ के समक्ष रखा गया।
| 👨⚖️ 13 न्यायाधीशों की खंडपीठ |
| मुख्य न्यायाधीश: एस. एम. सीकरी (CJI) |
| अन्य न्यायाधीश: शेलत, हेगडे, ग्रोवर, जगन्नाथदास, मुखर्जी, जफर इमाम, पालेकर, द्विवेदी, भगवती, चंद्रचूड़, मथ्यू, बेग |
| सुनवाई अवधि: 68 दिन (भारत की सबसे लंबी सुनवाई) |
| निर्णय दिनांक: 24 अप्रैल, 1973 |
| निर्णय का आकार: 700 पृष्ठों से अधिक |
न्यायालय ने 7:6 के बहुमत से निर्णय दिया। न्यायाधीश निम्नलिखित बिंदुओं पर सहमत थे:
| 🏛️ मूल ढाँचे का सिद्धांत — Core Principle |
| संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन कर सकती है, |
| परंतु संसद संविधान के ‘मूल ढाँचे’ (Basic Structure) को नष्ट नहीं कर सकती। |
| यदि कोई संशोधन मूल ढाँचे को तोड़ता है, तो वह असंवैधानिक माना जाएगा। |
न्यायालय ने मूल ढाँचे की कोई निश्चित सूची नहीं दी, लेकिन विभिन्न न्यायाधीशों ने निम्नलिखित तत्वों का उल्लेख किया:
| मूल ढाँचे का तत्व | सम्बद्ध प्रावधान |
| संविधान की सर्वोच्चता | प्रस्तावना |
| गणतांत्रिक एवं लोकतांत्रिक शासन | अनु. 1, प्रस्तावना |
| संविधान का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप | प्रस्तावना, अनु. 25-28 |
| शक्तियों का पृथक्करण | अनु. 50, 121, 211 |
| संघीय ढाँचा | अनु. 1, भाग XI |
| न्यायिक समीक्षा | अनु. 13, 32, 226 |
| स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका | अनु. 124-147 |
| मौलिक अधिकारों का सार | भाग III |
| राष्ट्र की एकता एवं अखंडता | प्रस्तावना, अनु. 1 |
| संसदीय शासन प्रणाली | अनु. 74, 75, 163, 164 |
न्यायालय ने गोलकनाथ वाद को पलटा और स्पष्ट किया:
| ⚡ न्यायाधीश नियुक्ति विवाद — 1973 |
| निर्णय के अगले ही दिन (25 अप्रैल, 1973) — इंदिरा गांधी सरकार ने CJI सीकरी के बाद |
| तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों (शेलत, हेगडे, ग्रोवर) को अनदेखा कर |
| न्या. ए. एन. रे को CJI नियुक्त किया — जो अल्पमत में थे! |
| यह ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता’ पर सीधा हमला माना गया। |
| तीनों वरिष्ठ न्यायाधीशों ने इस्तीफा दे दिया। |
इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल (1975-77) के दौरान 42वाँ संविधान संशोधन पारित किया:
| ✅ मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) |
| सर्वोच्च न्यायालय ने 42वें संशोधन के उन प्रावधानों को रद्द किया जो न्यायिक समीक्षा हटाते थे। |
| Basic Structure Doctrine को पुनः पुष्टि मिली। |
| न्या. चंद्रचूड़ (CJI): ‘सीमित संशोधन शक्ति ही संविधान की विशेषता है।’ |
| वाद | Basic Structure की प्रासंगिकता |
| इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण (1975) | चुनाव कानून संशोधन — Basic Structure लागू |
| मिनर्वा मिल्स (1980) | 42वाँ संशोधन रद्द — Basic Structure पुष्ट |
| वामन राव (1981) | भूमि सुधार — 9वीं अनुसूची की समीक्षा |
| एस. आर. बोम्मई (1994) | संघीय ढाँचा Basic Structure का हिस्सा |
| I.R. Coelho (2007) | 9वीं अनुसूची — Basic Structure से परे नहीं |
| केजरीवाल सरकार बनाम LG (2023) | लोकतांत्रिक जवाबदेही — Basic Structure |
| विषय | तथ्य |
| वाद संख्या | WP 135/1970 |
| निर्णय तिथि | 24 अप्रैल, 1973 |
| पीठ | 13 न्यायाधीश (सबसे बड़ी) |
| मत विभाजन | 7:6 बहुमत |
| सुनवाई दिन | 68 दिन |
| सबसे स्पष्ट मत | न्या. एच. आर. खन्ना |
| गोलकनाथ पर | पलटा गया (Overruled) |
| 42वाँ संशोधन | Basic Structure के विरुद्ध — बाद में रद्द |
| 💡 UPSC के लिए मुख्य संदेश |
| केशवानंद भारती वाद ने स्थापित किया कि: |
| 1. संसद शक्तिशाली है — लेकिन असीमित नहीं। |
| 2. संविधान सर्वोच्च है — लोकतंत्र का आधार है। |
| 3. न्यायपालिका संविधान की संरक्षक है। |
| 4. जनता के अधिकारों की रक्षा Basic Structure से होती है। |
| यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी सुरक्षा-कवच है। |
source https://en.wikipedia.org/wiki/Kesavananda_Bharati_v._State_of_Kerala
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