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इंग्लैंड की क्रांति एक गौरवपूर्णक्रांति मानी जाती है जिसका मुख कारण इसके रक्तहिन स्वभाव से है, 1688 इसवी में हुई ये क्रांति जेम्स द्वितीय की निरंकुशता का परिणाम था

इंग्लैंड की 1688 की क्रांति को ‘गौरवपूर्ण क्रांति’ (Glorious Revolution) के नाम से जाना जाता है। यह क्रांति बिना किसी बड़े रक्तपात के संपन्न हुई, इसलिए इसे ‘रक्तहीन क्रांति‘ भी कहते हैं।
इंग्लैंड के राजा जेम्स द्वितीय (James II) की निरंकुश नीतियाँ, उनका कैथोलिक धर्म के प्रति झुकाव और संसद की अवहेलना इस क्रांति के प्रमुख कारण थे। राजा जेम्स II ने ‘Declarations of Indulgence’ जारी कर कैथोलिकों और असहमत प्रोटेस्टेंटों को धार्मिक स्वतंत्रता दी, जिससे संसद असंतुष्ट हो गई।
संसद के प्रमुख नेताओं ने डच राजकुमार विलियम ऑफ ऑरेंज (William of Orange) को इंग्लैंड आने का निमंत्रण दिया। विलियम, जेम्स II की प्रोटेस्टेंट पुत्री मैरी के पति थे।
1688 में विलियम ऑफ ऑरेंज एक बड़ी सेना लेकर इंग्लैंड आए। जेम्स II की सेना ने विद्रोह किया और वह फ्रांस भाग गए। इस प्रकार बिना किसी युद्ध के सत्ता परिवर्तन हो गया।
1689 में संसद ने ‘Bill of Rights’ (अधिकार पत्र) पारित किया, जो इंग्लैंड के इतिहास में एक ऐतिहासिक दस्तावेज बन गया। इसी के साथ विलियम तृतीय और मैरी द्वितीय को इंग्लैंड के संयुक्त शासक घोषित किया गया।
• संसद की अनुमति के बिना राजा न तो कानून बना सकता था और न ही कर लगा सकता था।
• संसद के सदस्यों को भाषण की स्वतंत्रता प्रदान की गई।
• नागरिकों को बंदूक रखने का अधिकार दिया गया।
• शांतिकाल में सेना की भर्ती के लिए संसद की स्वीकृति अनिवार्य की गई।
• निष्पक्ष एवं नियमित चुनावों की व्यवस्था की गई।
इस क्रांति ने इंग्लैंड में संसदीय लोकतंत्र की नींव रखी। राजा की निरंकुश शक्तियाँ सीमित हो गईं और संसद सर्वोच्च हो गई। यह घटना ‘संसदीय संप्रभुता’ (Parliamentary Sovereignty) के सिद्धांत की स्थापना का प्रतीक बनी।
इस क्रांति का प्रभाव केवल इंग्लैंड तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने अमेरिकी क्रांति (1776) और फ्रांसीसी क्रांति (1789) को भी प्रेरित किया। विश्व भर में लोकतांत्रिक आंदोलनों के लिए यह क्रांति एक आदर्श बन गई।
John Locke जैसे विचारकों ने इस क्रांति को दार्शनिक आधार प्रदान किया। Locke ने अपनी पुस्तक ‘Two Treatises of Government’ में जनता के अधिकारों और सरकार की सीमाओं पर विचार प्रस्तुत किए।
• 1688 की क्रांति = गौरवपूर्ण क्रांति / रक्तहीन क्रांति
• जेम्स II की निरंकुश नीतियाँ → संसद का विरोध → विलियम ऑफ ऑरेंज का आगमन
• Bill of Rights 1689 → संसदीय सर्वोच्चता की स्थापना
• John Locke का योगदान — सामाजिक अनुबंध सिद्धांत
• प्रभाव: अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम, फ्रांसीसी क्रांति को प्रेरणा
औद्योगिक क्रांति 18वीं सदी के उत्तरार्ध में इंग्लैंड में आरंभ हुई और 19वीं सदी में यूरोप तथा अमेरिका में फैली। इस काल में हस्तशिल्प एवं कुटीर उद्योगों का स्थान मशीनी उद्योगों ने ले लिया। ऊर्जा के नए स्रोतों — विशेष रूप से वाष्प इंजन — के उपयोग से उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।
इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति सबसे पहले आने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे:
(क) कृषि क्रांति: 18वीं सदी में इंग्लैंड में कृषि क्षेत्र में सुधार हुए। ‘Enclosure Movement’ के कारण किसान भूमिहीन हो गए और शहरों में कारखानों में काम के लिए सस्ता श्रम उपलब्ध हो गया।
(ख) प्राकृतिक संसाधन: इंग्लैंड में कोयले और लोहे के प्रचुर भंडार थे, जो उद्योगों की आधारशिला थे।
(ग) व्यापारिक साम्राज्य: ब्रिटेन का विशाल उपनिवेश तंत्र था, जो कच्चे माल की आपूर्ति और तैयार माल के लिए बाजार उपलब्ध कराता था।
(घ) वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति: नए आविष्कारों — जैसे जेम्स वाट का वाष्प इंजन, स्पिनिंग जेनी, पावर लूम — ने उत्पादन प्रक्रिया में क्रांति ला दी।
(ङ) पूंजी की उपलब्धता: व्यापार और बैंकिंग के विकास से उद्योगों में निवेश के लिए पूंजी सुलभ हो गई।
• 1764 — जेम्स हारग्रीव्स (James Hargreaves) — स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny): एक साथ कई धागे कातने की मशीन।
• 1769 — जेम्स वाट (James Watt) — वाष्प इंजन (Steam Engine) में सुधार: यह औद्योगिक क्रांति का सबसे महत्वपूर्ण आविष्कार था।
• 1785 — एडमंड कार्टराइट (Edmund Cartwright) — पावर लूम (Power Loom): कपड़ा बुनने की मशीन।
• 1814 — जॉर्ज स्टीफेंसन (George Stephenson) — भाप इंजन से चलने वाला रेलवे इंजन (Locomotive)।
• अब्राहम डर्बी (Abraham Darby) — कोक से लोहा गलाने की विधि, जिससे सस्ता और मजबूत लोहा मिलने लगा।
प्रथम चरण (1760-1840): इंग्लैंड में वस्त्र उद्योग, लोहा-इस्पात, और कोयले का विकास। वाष्प ऊर्जा का प्रसार।
द्वितीय चरण (1840-1900): रेलवे का विस्तार, स्टील उद्योग, रासायनिक उद्योग, बिजली का उपयोग। जर्मनी, फ्रांस, और अमेरिका में भी औद्योगीकरण।
(क) शहरीकरण: गाँवों से शहरों की ओर पलायन बढ़ा। बड़े औद्योगिक नगरों — मैनचेस्टर, बर्मिंघम, लीड्स — का उदय हुआ।
(ख) नए वर्गों का उदय: ‘बुर्जुआ’ (पूंजीपति वर्ग) और ‘सर्वहारा’ (मजदूर वर्ग) का उभार हुआ। इसी विरोधाभास ने मार्क्सवाद को जन्म दिया।
(ग) श्रमिकों की दुर्दशा: लंबे काम के घंटे, कम मजदूरी, बाल श्रम, और कारखानों में अमानवीय परिस्थितियाँ। इसके विरोध में Trade Union आंदोलन उभरा।
(घ) उपनिवेशवाद को बढ़ावा: कच्चे माल की माँग बढ़ने से यूरोपीय देशों ने एशिया और अफ्रीका में उपनिवेश स्थापित किए।
(ङ) महिलाओं की भूमिका: कारखानों में महिला श्रमिकों की संख्या बढ़ी, जिससे भविष्य में नारी आंदोलन को बल मिला।
भारत के संदर्भ में औद्योगिक क्रांति का प्रभाव विनाशकारी रहा। ब्रिटेन की मशीनों से बना सस्ता कपड़ा भारतीय बाजारों में भर गया, जिससे भारत के हथकरघा उद्योग चौपट हो गए। ढाका की मलमल और मुर्शिदाबाद की रेशमी साड़ियाँ जो कभी विश्व-प्रसिद्ध थीं, अब बाजार से गायब होने लगीं।
भारत ब्रिटेन के लिए कच्चे माल (कपास, जूट, नील, अफीम) का आपूर्तिकर्ता और तैयार माल का बाजार बन गया। इसी आर्थिक शोषण के विरुद्ध दादाभाई नौरोजी ने ‘Drain of Wealth’ (धन की निकासी) का सिद्धांत प्रस्तुत किया।
• औद्योगिक क्रांति का प्रारंभ — इंग्लैंड — 18वीं सदी का उत्तरार्ध
• प्रमुख आविष्कार: स्पिनिंग जेनी, वाष्प इंजन, पावर लूम, रेलवे
• सामाजिक प्रभाव: शहरीकरण, बुर्जुआ-सर्वहारा वर्ग, ट्रेड यूनियन
• भारत पर प्रभाव: हस्तशिल्प उद्योगों का पतन, धन की निकासी
• मार्क्सवाद का उद्भव औद्योगिक क्रांति की प्रतिक्रिया में हुआ
• द्वितीय औद्योगिक क्रांति (1870 के बाद): विद्युत, इस्पात, रसायन