केशवानंद भारती वाद 1973 | Basic Structure Doctrine | UPSC Notes in Hindi KeshavanandCase 1973 — Basic Structure Kya Hai? | UPSC Hindiकेशवानंद भारती वाद 1973 | Basic Structure Doctrine | nani palkivala k tark
22 May 2026
केशवानंद भारती मामला (1973)क्या है भारतीय संवैधानिक कानून ?
केशवानंद भारती मामला (1973) भारतीय न्यायिक इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण फैसला है, जिसने संसद की संविधान संशोधन की असीमित शक्तियों पर रोक लगाई
आधारभूत संरचना
‘आधारभूत संरचना' सिद्धांत का विकास
संविधान की आधारभूत संरचना का तात्पर्य संविधान में निहित उन प्रावधानों से है, जो भारतीय संविधान के लोकतांत्रिक आदर्शों को प्रस्तुत करते हैं। इन प्रावधानों को संविधान में संशोधन के द्वारा भी नहीं हटाया जा सकता है।
वस्तुतः ये प्रावधान अपने आप में इतने महत्त्वपूर्ण हैं कि इनमें नकारात्मक बदलाव से संविधान का सार-तत्त्व, जो जनमानस के विकास के लिये आवश्यक है, नकारात्मक रूप से प्रभावित होगा।
‘आधारभूत संरचना' सिद्धांत का विकास:
पृष्ठभूमि और संघर्ष
🔖 29वाँ संविधान संशोधन, 1972 — क्या था?
यह संशोधन केशवानंद भारती वाद को प्रत्यक्ष रूप से उकसाने वाला कारण बना।
इस संशोधन द्वारा दो केरल कानूनों को 9वीं अनुसूची में जोड़ा गया:
1. Kerala Land Reforms Act, 1963 (संशोधित 1969)
2. Kerala Land Reforms (Amendment) Act, 1971
9वीं अनुसूची में रखने का अर्थ: ये कानून अनु. 31B के तहत न्यायिक समीक्षा से परे हो जाते।
अर्थात — इन कानूनों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।
29वें संशोधन का महत्व — UPSC दृष्टि से
पहलू
विवरण
संशोधन वर्ष
1972 (लागू: जनवरी 1973)
9वीं अनुसूची
1951 में 1st संशोधन द्वारा जोड़ी — भूमि सुधार कानूनों की रक्षा
अनु. 31B
9वीं अनुसूची के कानून — मौलिक अधिकार उल्लंघन पर अदालत में चुनौती नहीं
केशवानंद का तर्क
यदि 9वीं अनुसूची न्यायिक समीक्षा से परे है, तो यह Basic Structure तोड़ता है
अंतिम परिणाम
I.R. Coelho (2007): 9वीं अनुसूची भी Basic Structure से परे नहीं
29वाँ संशोधन ही वह trigger था जिसने केशवानंद भारती को सर्वोच्च न्यायालय जाने पर मजबूर किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह संशोधन न केवल उनके मौलिक अधिकार छीनता है, बल्कि स्वयं संविधान के ढाँचे को भी नष्ट करता है।
2.4 नानी पालकीवाला का वक्तव्य और भूमिका
केशवानंद भारती मामला (1973) जो यह तय करता है कि संसद संविधान के मुख्य स्वरूप (जैसे- लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्यायिक समीक्षा) को नहीं बदल सकती।
👨⚖️ नानी पालकीवाला — कौन थे?
पूरा नाम: नानाभॉय अर्देशिर पालकीवाला (Nani Ardeshir Palkhivala)
जन्म: 16 जनवरी, 1920 — मुंबई
पेशा: भारत के महानतम संवैधानिक वकीलों में से एक
विशेषता: संवैधानिक कानून, कर कानून, अंतर्राष्ट्रीय कानून
अन्य भूमिका: भारत के राजदूत — अमेरिका (1977-79)
केशवानंद केस में: याचिकाकर्ता की ओर से मुख्य वकील
पालकीवाला के ऐतिहासिक तर्क (Arguments)
पालकीवाला ने 68 दिनों की सुनवाई में जो तर्क दिए, वे भारतीय कानूनी इतिहास की धरोहर हैं:
‘संशोधन' और ‘विनाश' में अंतर:
अनु. 368 संसद को संविधान ‘amend' करने की शक्ति देता है — ‘destroy' करने की नहीं।
‘Amendment' शब्द का अर्थ सुधारना है, मिटाना नहीं।
यदि संसद संविधान को ही नष्ट कर सकती है, तो वह ‘Constituent Assembly' बन जाती है — जो वह नहीं है।
संविधान की पहचान
(Constitutional Identity):
प्रत्येक संविधान की एक आत्मा होती है — उसे बदला नहीं जा सकता।
भारत का संविधान लोकतंत्र, न्यायिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों पर आधारित है।
इन्हें नष्ट करने का अर्थ होगा — एक नया संविधान बनाना, जो जनता की सहमति के बिना नहीं हो सकता।
गोलकनाथ वाद की सीमाएँ:
पालकीवाला ने स्वयं माना कि गोलकनाथ का निर्णय बहुत कठोर था।
उन्होंने कहा — ‘संसद संशोधन कर सकती है, लेकिन उसकी एक सीमा होनी चाहिए।'
यही मध्य मार्ग आगे चलकर Basic Structure बना।
न्यायिक समीक्षा की अनिवार्यता:
यदि संसदीय संशोधनों की न्यायिक समीक्षा बंद हो जाए, तो नागरिकों की रक्षा कैसे होगी?
Judicial Review लोकतंत्र का कवच है — इसे हटाना संविधान को निहत्था करना है।
पालकीवाला का प्रसिद्ध कथन
/
पालकीवाला के ऐतिहासिक तर्क
💬 पालकीवाला के ऐतिहासिक वचन
“The Constitution is not a mere political document; it is a social contract between the people
and their representatives. No generation has the right to mortgage the future of
all subsequent generations by destroying the basic framework of the Constitution.”
अर्थ: संविधान केवल एक राजनीतिक दस्तावेज नहीं है — यह जनता और उनके प्रतिनिधियों के बीच
एक सामाजिक अनुबंध है। किसी एक पीढ़ी को यह अधिकार नहीं कि वह संविधान के मूल ढाँचे को
नष्ट करके आने वाली पीढ़ियों का भविष्य गिरवी रख दे।
“A Parliament elected on adult franchise cannot be granted the power to destroy
the very document which created it and gave it authority.”
पालकीवाला का प्रभाव — क्यों इतने महत्वपूर्ण?
पक्ष
पालकीवाला का योगदान
कानूनी तर्क
Basic Structure की अवधारणा को परिष्कृत रूप दिया
गोलकनाथ का संतुलन
न पूर्ण असंशोधनीयता, न असीमित शक्ति — मध्य मार्ग प्रस्तुत किया
7:6 निर्णय
उनके तर्कों ने बहुमत को प्रभावित किया
42वें संशोधन पर
1976 में भी पालकीवाला ने 42वें संशोधन की आलोचना की
राष्ट्रीय योगदान
उन्हें ‘भारतीय संविधान का संरक्षक' कहा जाता है
2.5
मूल विवाद — सारांश
केशवानंद भारती ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की और तर्क दिया कि:
ये कानून उनके मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 25, 26, 14, 19, 31) का उल्लंघन करते हैं।
24वाँ व 25वाँ संविधान संशोधन असंवैधानिक हैं।
मूल विवाद — सारांश
29वाँ संशोधन — 9वीं अनुसूची में केरल कानून — न्यायिक समीक्षा को खत्म नहीं कर सकता।
2.6 केंद्रीय कानूनी प्रश्न
⚖️ मुख्य प्रश्न जो न्यायालय के सामने थे
1. क्या संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान के किसी भी भाग को संशोधित कर सकती है?
2. क्या 24वाँ संशोधन (जो संसद को मौलिक अधिकार बदलने की शक्ति देता है) वैध है?
3. क्या 25वाँ संशोधन (अनु. 31C — संपत्ति) न्यायिक समीक्षा से परे है?
4. क्या गोलकनाथ वाद का निर्णय सही था?
3. मूल ढाँचे का सिद्धांत (Basic Structure Doctrine)
3.1 पीठ का गठन
यह मामला 13 न्यायाधीशों की अब तक की सबसे बड़ी संवैधानिक पीठ के समक्ष रखा गया।
👨⚖️ 13 न्यायाधीशों की खंडपीठ
मुख्य न्यायाधीश: एस. एम. सीकरी (CJI)
अन्य न्यायाधीश: शेलत, हेगडे, ग्रोवर, जगन्नाथदास, मुखर्जी, जफर इमाम, पालेकर, द्विवेदी, भगवती, चंद्रचूड़, मथ्यू, बेग
सुनवाई अवधि: 68 दिन (भारत की सबसे लंबी सुनवाई)
निर्णय दिनांक: 24 अप्रैल, 1973
निर्णय का आकार: 700 पृष्ठों से अधिक
3.2 निर्णय (7:6 बहुमत)
न्यायालय ने 7:6 के बहुमत से निर्णय दिया। न्यायाधीश निम्नलिखित बिंदुओं पर सहमत थे:
मुख्य सिद्धांत — मूल ढाँचा
🏛️ मूल ढाँचे का सिद्धांत — Core Principle
संसद अनुच्छेद 368 के तहत संविधान में संशोधन कर सकती है,
परंतु संसद संविधान के ‘मूल ढाँचे' (Basic Structure) को नष्ट नहीं कर सकती।
यदि कोई संशोधन मूल ढाँचे को तोड़ता है, तो वह असंवैधानिक माना जाएगा।
3.3 मूल ढाँचे के तत्व (Elements of Basic Structure)
न्यायालय ने मूल ढाँचे की कोई निश्चित सूची नहीं दी, लेकिन विभिन्न न्यायाधीशों ने निम्नलिखित तत्वों का उल्लेख किया:
मूल ढाँचे का तत्व
सम्बद्ध प्रावधान
संविधान की सर्वोच्चता
प्रस्तावना
गणतांत्रिक एवं लोकतांत्रिक शासन
अनु. 1, प्रस्तावना
संविधान का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप
प्रस्तावना, अनु. 25-28
शक्तियों का पृथक्करण
अनु. 50, 121, 211
संघीय ढाँचा
अनु. 1, भाग XI
न्यायिक समीक्षा
अनु. 13, 32, 226
स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका
अनु. 124-147
मौलिक अधिकारों का सार
भाग III
राष्ट्र की एकता एवं अखंडता
प्रस्तावना, अनु. 1
संसदीय शासन प्रणाली
अनु. 74, 75, 163, 164
3.4 प्रमुख न्यायाधीशों के मत
बहुमत (7 न्यायाधीश) — मूल ढाँचे के पक्ष में
न्या. सीकरी: संविधान की पहचान नष्ट नहीं की जा सकती
न्या. शेलत व हेगडे: संविधान एक सामाजिक अनुबंध है, संसद इसे मिटा नहीं सकती
न्या. जगन्नाथदास: अनु. 368 ‘संशोधन' की शक्ति देता है, ‘विनाश' की नहीं
न्या. मुखर्जी: संविधान का कुछ भाग न्यायिक समीक्षा से परे नहीं हो सकता
न्या. खन्ना (सबसे स्पष्ट मत): ‘मूल ढाँचा' — लोकतंत्र, संविधान सर्वोच्चता, न्यायिक समीक्षा
अल्पमत (6 न्यायाधीश) — संसद की असीमित शक्ति के पक्ष में
न्या. रे, भगवती, बेग, चंद्रचूड़: संसद को पूर्ण शक्ति — कोई भी प्रतिबंध नहीं
न्या. द्विवेदी: लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी संसद सर्वोच्च
3.5 अनुच्छेद 368 की व्याख्या
न्यायालय ने गोलकनाथ वाद को पलटा और स्पष्ट किया:
संसद को संशोधन की शक्ति है — गोलकनाथ का यह मत गलत था कि मौलिक अधिकार पूरी तरह असंशोधनीय हैं
परंतु ‘संशोधन' का अर्थ ‘विनाश' नहीं है — संसद मूल ढाँचे को नष्ट नहीं कर सकती
24वाँ संविधान संशोधन — वैध घोषित (संसद मौलिक अधिकार बदल सकती है)
25वाँ संशोधन (अनु. 31C) — आंशिक रूप से वैध, लेकिन जो भाग न्यायिक समीक्षा हटाता था वह रद्द
4. प्रभाव एवं महत्व (Impact & Significance)
4.1 तत्कालीन राजनीतिक प्रतिक्रिया
⚡ न्यायाधीश नियुक्ति विवाद — 1973
निर्णय के अगले ही दिन (25 अप्रैल, 1973) — इंदिरा गांधी सरकार ने CJI सीकरी के बाद
तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों (शेलत, हेगडे, ग्रोवर) को अनदेखा कर
न्या. ए. एन. रे को CJI नियुक्त किया — जो अल्पमत में थे!
यह ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता' पर सीधा हमला माना गया।
तीनों वरिष्ठ न्यायाधीशों ने इस्तीफा दे दिया।
4.2 आपातकाल और 42वाँ संशोधन (1976)
इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल (1975-77) के दौरान 42वाँ संविधान संशोधन पारित किया:
अनु. 368(4) जोड़ा — ‘किसी भी संशोधन को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती'
अनु. 368(5) जोड़ा — ‘संसद की संशोधन शक्ति पर कोई प्रतिबंध नहीं'
यह स्पष्ट रूप से केशवानंद भारती के निर्णय को पलटने का प्रयास था
4.3 मिनर्वा मिल्स वाद (1980) — Basic Structure की पुष्टि
✅ मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)
सर्वोच्च न्यायालय ने 42वें संशोधन के उन प्रावधानों को रद्द किया जो न्यायिक समीक्षा हटाते थे।
Basic Structure Doctrine को पुनः पुष्टि मिली।
न्या. चंद्रचूड़ (CJI): ‘सीमित संशोधन शक्ति ही संविधान की विशेषता है।'
4.4 भारत के बाहर प्रभाव
बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका — इन देशों के न्यायालयों ने भी Basic Structure अपनाया
विश्व के कई लोकतांत्रिक देशों में इस सिद्धांत को संदर्भ के रूप में लिया जाता है
5. बाद के प्रमुख मामले (Subsequent Cases)
वाद
Basic Structure की प्रासंगिकता
इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण (1975)
चुनाव कानून संशोधन — Basic Structure लागू
मिनर्वा मिल्स (1980)
42वाँ संशोधन रद्द — Basic Structure पुष्ट
वामन राव (1981)
भूमि सुधार — 9वीं अनुसूची की समीक्षा
एस. आर. बोम्मई (1994)
संघीय ढाँचा Basic Structure का हिस्सा
I.R. Coelho (2007)
9वीं अनुसूची — Basic Structure से परे नहीं
केजरीवाल सरकार बनाम LG (2023)
लोकतांत्रिक जवाबदेही — Basic Structure
6. UPSC परीक्षा दृष्टिकोण
6.1 महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Facts)
विषय
तथ्य
वाद संख्या
WP 135/1970
निर्णय तिथि
24 अप्रैल, 1973
पीठ
13 न्यायाधीश (सबसे बड़ी)
मत विभाजन
7:6 बहुमत
सुनवाई दिन
68 दिन
सबसे स्पष्ट मत
न्या. एच. आर. खन्ना
गोलकनाथ पर
पलटा गया (Overruled)
42वाँ संशोधन
Basic Structure के विरुद्ध — बाद में रद्द
6.2 संभावित प्रश्न
Basic Structure Doctrine क्या है? इसे किस वाद में स्थापित किया गया? (150 शब्द)
केशवानंद भारती वाद भारतीय लोकतंत्र के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? (250 शब्द)
‘संसद सर्वोच्च है या संविधान?' — इस प्रश्न पर केशवानंद भारती वाद के संदर्भ में चर्चा करें।
न्यायिक समीक्षा और Basic Structure के संबंध को स्पष्ट करें।
6.3 मुख्य परीक्षा विश्लेषण बिंदु
संसद बनाम न्यायपालिका — शक्ति संतुलन
लोकतंत्र में संविधान की भूमिका — ‘living document' बनाम ‘rigid constitution'



